महिलाओं की छवि ख़राब करता वर्तमान टीवी

 पायल गुप्ता
सर्व विदित है कि टीवी मनोरंजन का सर्वश्रेष्ठ और प्रभावशाली साधन है । प्रत्येक व्यक्ति कभी ना कभी टीवी पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों और फिल्मों से प्रभावित प्रभावित होता है, यहां तक कि टेलीविजन पर विभिन्न कलाकारों का अभिनय देखकर हम वास्तविक जीवन में भी उनकी वैसी ही छवि की कल्पना कर लेते हैं । इसका अभिप्राय है कि टीवी पर अभिनय करने वाले कलाकारों की छवि को बनाने और बिगाड़ने का श्रेय भी टीवी को ही जाता है ।
बात करें यदि टीवी पर दिखाए जाने वाले विभिन्न धारावाहिकों की तो यह सीरियल हालांकि वास्तविक जीवन में चलने वाली घटनाओं पर ही आधारित होते हैं, लेकिन मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन टीवी वर्तमान में समाज को एक सकारात्मक दिशा देने के बजाय उन्हें गुमराह करने का काम भी कर रहा है । इन्हीं धारावाहिकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है महिलाएं । जहां एक तरफ आरंभ में ज्यादातर पुरुषों को ही नकारात्मक भूमिका में प्रदर्शित किया जाता था, महिलाओं को घर बनाने वाली की भूमिका में रखा जाता था, किंतु वर्तमान में लगभग टीवी सीरियल में महिलाएं नकारात्मक भूमिका में नजर आ रही है । इसका महिलाओं की छवि पर भी प्रभाव पड़ रहा है । आजकल की धारावाहिक में एकता का संदेश देने की स्थान पर पैदा करने वाली महिलाओं का बोलबाला है, यहां तक कि कई धारावाहिक तो भूत-प्रेतों, डायनों और नागिन का किरदार पर बेहद शान से उतारते हैं । जहां अब से कुछ देर पहले आप सास-बहू की गुत्थी में उलझे थे वही थोड़ी देर बाद किसी नागिन, चुड़ैल या डायन के चंगुल में फँसे नज़र आएंगे कुल मिलाकर प्रत्येक धारावाहिक में अब आपको एक महिला विलेन रूप में नजर आएगी । भले ही यह अभिनेत्रियाँ इन किरदारों से संतुष्ट हो और भला हो भी क्यों ना आखिर उनकी एक्टिंग ही तो उनके रोजगार का साधन है, परंतु आम जनता उनकी इस तरह की विकृत मानसिकता को ना तो पसंद करती है और ना ही समाज इन्हें उपयोगी मानता है बल्कि उसके वास्तविक जीवन के प्रति अपना भी रखता है
सास-बहू ऊपर आधारित सीरियल वास्तविक जिंदगी में परंपरागत तरीके से बनाए गए घर को विकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं और साथ ही दोनों को इस बात के लिए प्रेरित भी करते हैं कि किस तरह एक दूसरे को नीचा दिखाए इतना ही नहीं हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अधिकांश परिवारों में तनाव विवाद और तलाक का कारण यह टीवी सीरियल ही होते हैं जिनकी किरदार तो पर्दे पर अपना अभिनय बखूबी कर जाते हैं पर दर्शकों की असल जिंदगी के दिलों और परिवारों में हमेशा के लिए अपनी छवि के साथ घर घर जाते हैं और परिवारों पर भी उसका गहरा असर पड़ता है। डाइनो और नागिनों से जुड़े धारावाहिकों में अंधविश्वास से जुड़ी परंपराओं को ही जीवंत कर के दिखाया जाता है। जैसे कि सीरियल में दिखाई जा रही डायन के पैर उल्टे हैं वह हनुमान चालीसा से डरती है, किसी भी रूप में रहती है, अलग अलग शरीरों में प्रवेश कर सकती है, मंदिर शिवालय इत्यादि में जाने से डरती है। यह सब तो पुराने ढर्रे पर चल ही रहा है किंतु महिलाओं की छवि को और और अधिक खराब करने के लिए इनमें अब सेक्स का तड़का भी लगा दिया गया है, जो देवी रूप कही जाने वाली महिलाओं की छवि को कलंकित करता है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या इस तरह की धारावाहिक महिलाओं की स्थिति को ऊपर उठाने का प्रयास प्रयास कर रहे हैं या फिर समाज में उनकी स्थिति को और भी निम्न करने का?
अधिकांश टेलीविजन धारावाहिक मुख्य तौर पर दो तरह से महिलाओं की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं । एक जगह उन के त्याग और बलिदान के नाम पर उनके विकास का विरोध करने की कोशिश की जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ उन्हें स्वार्थी और षड्यंत्रकारी बताकर पूरी महिला जाति की छवि को धूमिल किया जा रहा है आखिर यही सब तो हो रहा है बदलाव के नाम पर । इसके विपरीत यदि बात की जाए पुरुषों की तो टीवी पर दिखाई जाने वाली नाटकों में पुरुषों का चित्रण लगभग एक ही तरह का होता है, इसमें अधिकतर पुरुष आत्मनिर्भर होते हैं, ताकतवर होते हैं, उनका बिजनेस होता है और समाज में नाम भी होता है उन्हें घर के मामलों में बहुत ही कम शामिल होते हुए दिखाया जाता है । ये पुरुष चुग़ली नहीं करते, साज़िशें नहीं रचते ।असल जिंदगी में भी उनसे अपेक्षा की जात है।
वास्तविकता यह है कि नाटक हमारी परंपरागत सोच के अनुरूप ही बनाए जाते हैं जिनके अनुसार स्त्री का जीवन मात्र घर संभालने में ही निकल जाता है और पुरुष बाहर का काम करता है।
घर पर रहने वाली महिला भावुक होकर टीवी धारावाहिकों को देखती है और असल जिंदगी से जोड़ कर देखने लगती है अर्थात उसे अपनी असल ज़िंदगी में भी अपनाने लगती है । एक वक्त था जब टेलीविजन ने लोगों को मनोरंजन व शिक्षा देने का बीड़ा उठाया था और उसमें सफलता भी हासिल की थी, किंतु आज समाज में अपराध, धोखेबाजी, क्रूरता इत्यादि को भी टीवी के द्वारा ही बढ़ावा मिल रहा है और समाज में यह असामाजिक तत्व फैलते जा रहे हैं । आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज के रख वालों को सिर्फ एक पक्ष को या एक वर्ग को ध्यान में रखकर काम नहीं करना चाहिए बल्कि सभी को बराबरी से लेना चाहिए । आखिर महिलाएं भी विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । सरकार को भी चाहिए कि इस तरह के धारावाहिकों पर रोक लगाए जो समाज का एक विपरीत आईना पेश करते हो या जिन का विपरीत प्रभाव हमारे भारतीय समाज पर पड़ता हो

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